By | September 5, 2021
Whats is Adjective | विशेषण किसे कहते हैं ?

आप जानते हैं विशेषण किसे कहते हैं ? तो आज हम आपको ” विशेषण किसे कहते हैं ” के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको विशेषण किसे कहते हैं पता चलेगा। तो आइये जानते हैं “विशेषण किसे कहते हैं”

विशेषण किसे कहते हैं ?

” जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता अथवा हीनता बताए , ‘ विशेषण ‘ कहलाता है और वह संज्ञा या सर्वनाम विशेष्य ‘ के नाम से जाना जाता है ।

” नीचे लिखे वाक्यों को देखें –

अच्छा आदमी सभी जगह सम्मान पाता है ।

बुरे आदमी को अपमानित होना पड़ता है ।

उक्त उदाहरणों में ‘ अच्छा ‘ और ‘ बुरा ‘ विशेषण एवं ‘ आदमी ‘ विशेष्य हैं ।

विशेषण हमारी जिज्ञासाओं का शमन ( समाधान ) भी करता है । उक्त उदाहण में ही –

कैसा आदमी ? – अच्छा / बुरा

विशेषण न सिर्फ विशेषता बताता है , बल्कि वह अपने विशेष्य की संख्या और परिमाण ( मात्रा ) भी बताता है । जैसे-

पाँच लड़के गेंद खेल रहे हैं । ( संख्याबोधक )

* विशेषण के कितने भेद हैं ?

विशेषण के चार प्रकार होते हैं :

  1. गुणवाचक विशेषण
  2. संख्यावाचक विशेषण
  3. परिमाणवाचक विशेषण
  4. सार्वनामिक विशेषण

1. गुणवाचक विशेषण :

” जो शब्द , किसी व्यक्ति या वस्तु के गुण , दोष , रंग , आकार , अवस्था , स्थिति , स्वभाव , दशा , दिशा , स्पर्श , गंध , स्वाद आदि का बोध कराए , ‘ गुणवाचक विशेषण ‘ कहलाते हैं ।

” गुणवाचक विशेषणों की गणना करना मुमकिन नहीं ; क्योंकि इसका क्षेत्र बड़ा ही विस्तृत हुआ करता है । जैसे –

  • गुणबोधक : अच्छा , भला , सुन्दर , श्रेष्ठ , शिष्ट , …..
  • दोषबोधक : बुरा , खराब , उदंड , जहरीला , …..
  • रंगबोधक : काला , गोरा , पीला , नीला , हरा , ….
  • कालबोधक : पुराना , प्राचीन , नवीन , क्षणिक , क्षणभंगुर , …..
  • स्थानबोधक : चीनी , मद्रासी , बिहारी , पंजाबी ,…..
  • गंधबोधक : खुशबूदार , सुगंधित ,…..
  • दिशाबोधक : पूर्वी , पश्चिमी , उत्तरी , दक्षिणी ,…..
  • अवस्था बोधक : गीला , सूखा , जला ,…..
  • दशाबोधक : अस्वस्थ , रोगी , भला , चंगा ..
  • आकारबोधक : मोटा , छोटा , बड़ा , लंबा ,
  • स्पर्शबोधक : कठोर , कोमल , मखमली ,
  • स्वादबोधक : खट्टा , मीठा , कसैला , नमकीन …

गुणवाचक विशेषणों में से कुछ विशेषण खास विशेष्यों के साथ प्रयुक्त होते हैं । उनके प्रयोग से वाक्य बहुत ही सुन्दर और मज़ेदार हो जाया करते हैं । नीचे लिखे उदाहरणों को देखें –

  1. इस चिलचिलाती धूप में घर से निकलना मुश्किल है ।
  2. इस मोहल्ले का बजबजाता नाला नगर निगम की पोल खोल रहा है ।
  3. मुझे लाल – लाल टमाटर बहुत पसंद हैं ।
  4. शालू के बाल बलखाती नागिन जैसे हैं ।

नोट : उपर्युक्त वाक्यों में चिलचिलाती ………. धूप के लिए , बजबजाता नाले के लिए , लाल – लाल टमाटर के लिए और बलखाती हैं । ऐसे विशेषणों को ‘ पदवाचक विशेषण ‘ कहा जाता है ।

क्षेत्रीय भाषाओं में जहाँ के लोग कम पढ़े – लिखे होते हैं , वे कभी – कभी उक्त विशेषणों से भी जानदार विशेषणों का प्रयोग करते देखे गए हैं । जैसे –

  • बहुत गहरे लाल के लिए : लाल टुह – टुह
  • बहुत सफेद के लिए : उज्जर बग – बग / दप – दप
  • बहुत ज्यादा काले के लिए : कार खुट खुट / करिया स्याह
  • बहुत अधिक तिक्त के लिए : नीम हर – हर
  • बहुत अधिक हरे के लिए : हरिअरहरा कचोर / हरिअर कच कच
  • बहुत अधिक खट्टा के लिए : खट्टा चुक – चुक / खट्टा चून
  • बहुत अधिक लंबे के लिए : लम्बा डग – डग
  • बहुत चिकने के लिए : चिक्कन चुलबुल
  • बहुत मैला / गंदा : मैल कुच – कुच
  • बहुत मोटे के लिए : मोटा थुलथुल
  • बहुत घने तारों के लिए : तारागज – गज
  • बहुत गहरा दोस्त : लैंगोटिया यार
  • बहुत मूर्ख के लिए : मूर्ख चपाट / चपाठ

2.संख्यावाचक विशेषण :

” वह विशेषण , जो अपने विशेष्यों की निश्चित या अनिश्चित संख्याओं का बोध कराए , ‘ संख्यावाचक विशेषण ‘ कहलाता है । जैसे –

उस मैदान में पाँच लड़के खेल रहे हैं ।

इस कक्षा के कुछ छात्र पिकनिक पर गए हैं ।

उक्त उदाहरणों में ‘ पाँच ‘ लड़कों की निश्चित संख्या एवं ‘ कुछ ‘ छात्रों की अनिश्चित संख्या बता रहे हैं ।

निश्चित संख्यावाचक विशेषण भी कई तरह के होते हैं

1. गणनावाचक : यह अपने विशेष्य की साधारण संख्या या गिनती बताता है । इसके भी दो प्रभेद होते हैं –

( a ) पूर्णांकबोधक / पूर्ण संख्यावाचक : इसमें पूर्ण संख्या का प्रयोग होता है । जैसे -चार छात्र , आठ लड़कियाँ …..

( b ) अपूर्णांक बोधक / अपूर्ण संख्यावाचक : इसमें अपूर्ण संख्या का प्रयोग होता है । जैसे – सवा रुपये , ढाई किमी. आदि।

2. क्रमवाचक : यह विशेष्य की क्रमात्मक संख्या यानी विशेष्य के क्रम को बतलाता है । इसका प्रयोग सदा एकवचन में होता है । जैसे – पहली कक्षा , दूसरा लड़का , तीसरा आदमी , चौथी खिड़की आदि ।

3. आवृत्तिवाचक : यह विशेष्य में किसी इकाई की आवृत्ति की संख्या बतलाता है । जैसे – दुगने छात्र , ढाई गुना लाभ आदि ।

4. संग्रहवाचक : यह अपने विशेष्य की सभी इकाइयों का संग्रह बतलाता है । जैसे – चारो आदमी , आठो पुस्तकें आदि ।

5. समुदायवाचक : यह वस्तुओं की सामुदायिक संख्या को व्यक्त करता है । जैसे – एक जोड़ी चप्पल , पाँच दर्जन कॉपियाँ आदि ।

6. वीप्सावाचक : व्यापकता का बोध करानेवाली संख्या को वीप्सावाचक कहते हैं । यह दो प्रकार से बनती है — संख्या के पूर्व प्रति , फी , हर , प्रत्येक इनमें से किसी के पूर्व प्रयोग से या संख्या के द्वित्व से । जैसे –

प्रत्येक तीन घंटों पर यहाँ से एक गाड़ी खुलती है ।

पाँच – पाँच छात्रों के लिए एक कमरा है ।

कभी कभी निश्चित संख्यावाची विशेषण भी अनिश्चयसूचक विशेषण के योग से अनिश्चित संख्यावाची बन जाते हैं । जैसे-

उस सभा में लगभग हजार व्यक्ति थे ।

आसपास की दो निश्चित संख्याओं का सह प्रयोग भी दोनों के आसपास की अनिश्चित संख्या को प्रकट करता है । जैसे –

मुझे हजार दो हजार रुपये दे दो ।

कुछ संख्याओं में ‘ ओं ‘ जोड़ने से उनके बहुत्व यानी अनिश्चित संख्या की प्रतीति होती है । जैसे –

सालों बाद उसका प्रवासी पति लौटा है ।

वैश्विक आर्थिक मंदी का असर करोड़ों लोगों पर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है ।

3. परिमाणवाचक विशेषण :

” वह विशेषण जो अपने विशेष्यों की निश्चित अथवा अनिश्चित मात्रा ( परिमाण ) का बीच कराए , ‘ परिमाणवाचक विशेषण ‘ कहलाता है ।

” इस विशेषण का एकमात्र विशेष्य द्रव्यवाचक संज्ञा है । जैसे –

मुझे थोड़ा दूध चाहिए , बच्चे भूखे हैं ।

बारात को खिलाने के लिए चार क्विटल चावल चाहिए ।

उपर्युक्त उदाहरणों में थोड़ा ‘ अनिश्चित एवं ‘ चार क्विटल ‘ निश्चित मात्रा का बोधक है ।

परिमाणवाचक से भिन्न संज्ञा शब्द भी परिमाणवाचक की भाँति प्रयुक्त होते हैं । जैसे –

चुल्लूभर पानी में डूब मरो ।

2007 की बाढ़ में सड़कों पर छाती भर पानी हो गया था ।

संख्यावाचक की तरह ही परिमाणवाचक में भी ‘ ओं ‘ के योग से अनिश्चित बहुत्व प्रकट होता है । जैसे-

उस पर तो घड़ों पानी पड़ गया है ।

4. सार्वनामिक विशेषण

हम जानते हैं कि विशेषण के प्रयोग से विशेष्य का क्षेत्र सीमित हो जाता है । जैसे – ‘ गाय ‘ कहने से उसके व्यापक क्षेत्र का बोध होता है , किन्तु ‘ काली गाय ‘ कहने से गाय का क्षेत्र सीमित हो जाता है । इसी तरह “ जब किसी सर्वनाम का मौलिक या यौगिक रूप किसी संज्ञा के पहले आकर उसके क्षेत्र को सीमित कर दे , तब वह सर्वनाम न रहकर सार्वनामिक विशेषण ‘ बन जाता है । ” जैसे –

यह गाय है । वह आदमी है ।

इन वाक्यों में ‘ यह ‘ एवं ‘ वह ‘ गाय तथा आदमी की निश्चितता का बोध कराने के कारण निश्चयवाचक सर्वनाम हुए ; किन्तु यदि ‘ यह ‘ एवं ‘ वह ‘ का प्रयोग इस रूप में किया जाय-

यह गाय बहुत दूध देती है ।

वह आदमी बड़ा मेहनती है ।

तो ‘ यह ‘ और ‘ वह ‘ ‘ गाय ‘ एवं आदमी के विशेषण बन जाते हैं । इसी तरह अन्य उदाहरणों को देखें –

  1. वह गदहा भागा जा रहा है ।
  2. जैसा काम वैसा ही दाम , यही तो नियम है ।
  3. जितनी आमद है उतना ही खर्च भी करो ।

* विशेषण के स्थानों के आधार पर वाक्यों को कितने में बाँटा गया है :

वाक्यों में विशेषण के स्थानों के आधार पर उन्हें दो भागों में बाँटा गया है –

  1. सामान्य विशेषण
  2. विधेय विशेषण

1. सामान्य विशेषण : जिस विशेषण का प्रयोग विशेष्य के पहले हो , वह ‘ सामान्य विशेषण ‘ कहलाता है । जैसे-

काली गाय बहुत सुन्दर लगती है ।

मेहनती आदमी कहीं भूखों नहीं मरता ।

2. विधेय विशेषण : जिस विशेषण का प्रयोग अपने विशेष्य के बाद हो , वह ‘ विधेय विशेषण ‘ कहलाता है । जैसे –

वह गाय बहुत काली है ।

आदमी बड़ा मेहनती था ।

* अन्तरविशेषण का दूसरा नाम क्या है :

विशेषण तो किसी संज्ञा अथवा सर्वनाम की विशेषता बताता है ; परन्तु कुछ शब्द विशेषण एवं क्रियाविशेषण ( Adverb ) की विशेषता बताने के कारण ‘ प्रविशेषण ‘ या अंतरविशेषण ‘ कहलाते हैं । नीचे लिखे उदाहरणों को ध्यानपूर्वक देखें-

1. विश्वजीत डरपोक लड़का है । ( विशेषण )

विश्वजीत बड़ा डरपोक लड़का है । ( प्रविशेषण )

2. सौरभ धीरे – धीरे पढ़ता है । ( क्रियाविशेषण )

सौरभ बहुत धीरे – धीरे पढ़ता है । ( प्रविशेषण )

उपर्युक्त वाक्यों में ‘ बड़ा ‘ , ‘ डरपोक ‘ विशेषण की और ‘ बहुत ‘ शब्द धीरे – धीरे ‘ क्रिया विशेषण की विशेषता बताने के कारण ‘ प्रविशेषण ‘ हुए ।

* तुलनावाचक की कितनी अवस्थाएँ होती हैं ?

” जिन विशेषणों के द्वारा दो या अधिक विशेष्यों के गुण – अवगुण की तुलना की जाती है , उन्हें ‘ तुलनाबोधक विशेषण ‘ कहते हैं ।

” तुलनात्मक दृष्टि से एक ही प्रकार की विशेषता बतानेवाले पदार्थों या व्यक्तियों में मात्रा का अन्तर होता है । तुलना के विचार से विशेषणों की तीन अवस्थाएँ होती हैं :

  1. मूलावस्था
  2. उत्तरावस्था
  3. उत्तमावस्था

1. मूलावस्था ( Positive Degree ) : इसके अंतर्गत विशेषणों का मूल रूप आता है । इस अवस्था में तुलना नहीं होती , सामान्य विशेषताओं का उल्लेख मात्र होता है । जैसे-

अंशु अच्छी लड़की है ।

आशु सुन्दर है ।

2. उत्तरावस्था ( ComparativeDegree ) : जब दो व्यक्तियों या वस्तुओं के बीच अधिकता या न्यूनता की तुलना होती है , तब उसे विशेषण की उत्तरावस्था कहते हैं । जैसे –

अंशु आशु से अच्छी लड़की है ।

आशु अंशु से सुन्दर है ।

उत्तरावस्था में केवल तत्सम शब्दों में ‘ तर ‘ प्रत्यय लगाया जाता है । जैसे –

  • सुन्दर + तर > सुन्दरतर
  • महत् + तर > महत्तर
  • लघु + तर > लघुतर
  • अधिक + तर > अधिकतर
  • दीर्घ + तर > दीर्घतर

हिन्दी में उत्तरावस्था का बोध कराने के लिए ‘ से ‘ और ‘ मैं ‘ चिह्न का प्रयोग किया जाता है । जैसे –

बच्ची फूल से भी कोमल है ।

इन दोनों लड़कियों में वह सुन्दर है ।

विशेषण की उत्तरावस्था का बोध कराने के लिए के अलावा ‘ , ‘ की तुलना में ‘ , ‘ के मुकाबले आदि पदों का प्रयोग भी किया जाता है । जैसे –

पटना के मुकाबले जमशेदपुर अधिक स्वच्छ है ।

संस्कृत की तुलना में अंग्रेजी कम कठिन है ।

आपके अलावा वहाँ कोई उपस्थित नहीं था ।

3. उत्तमावस्था ( Superlative Degree ) : यह विशेषण की सर्वोत्तम अवस्था है । जब दो से अधिक व्यक्तियों या वस्तुओं के बीच तुलना की जाती है और उनमें से एक को श्रेष्ठता या निम्नता दी जाती है , तब विशेषण की उत्तमावस्था कहलाती है । जैसे-

कपिल सबसे या सबों में अच्छा है ।

दीपू सबसे घटिया विचारवाला लड़का है ।

तत्सम शब्दों की उत्तमावस्था के लिए ‘ तम ‘ प्रत्यय जोड़ा जाता है । जैसे-

सुन्दर + तम > सुन्दरतम

महत् + तम > महत्तम

लघु + तम > लघुतम

अधिक + तम > अधिकतम

श्रेष्ठ + तम > श्रेष्ठतम

‘ श्रेष्ठ ‘ , के पूर्व , ‘ सर्व ‘ जोड़कर भी इसकी उत्तमावस्था दर्शायी जाती है । जैसे –

नीरज सर्वश्रेष्ठ लड़का है ।

फारसी के ‘ ईन ‘ प्रत्यय जोड़कर भी उत्तमावस्था दर्शायी जाती है । जैसे –

बगदाद बेहतरीन शहर है ।

* विशेषणों की रचना कैसे बनती हैं :

विशेषण पदों की रचना प्रायः सभी प्रकार के शब्दों से होती है । शब्दों के अन्त में ई , इक , • मान् , वान् , हार , वाला , आ , ईय , शाली , हीन , युक्त , ईला प्रत्यय लगाने से और कई बार अंतिम प्रत्यय का लोप करने से विशेषण बनते हैं ।

  • ‘ ई ‘ प्रत्यय : शहर – शहरी , भीतर – भीतरी , क्रोध – क्रोधी
  • ‘ इक ‘ प्रत्यय : शरीर – शारीरिक , मन – मानसिक , अंतर – आंतरिक
  • ‘ मान् ‘ प्रत्यय ‘ : श्री – श्रीमान् , बुद्धि – बुद्धिमान , शक्ति – शक्तिमान्
  • वान् प्रत्यय : धन – धनवान् , रूप – रूपवान् , बल – बलवान्
  • ‘ हार ‘ या ‘ हार ‘ प्रत्यय : सृजन – सृजनहार , पालन – पालनहार
  • ‘ वाला ‘ प्रत्यय : रथ रथवाला , दूध – दूधवाला
  • ‘ आ ‘ प्रत्यय : भूख – भूखा , प्यास – प्यासा
  • ‘ ईय ‘ प्रत्यय : भारत – भारतीय , स्वर्ग – स्वर्गीय
  • ‘ ईला ‘ प्रत्यय : चमक – चमकीला , नोंक – नुकीला
  • हीन ‘ प्रत्यय : धन – धनहीन , तेज – तेजहीन , दया – दयाहीन
  • धातुज : नहाना – नहाया खाना – खाया , खाऊ , चलना – चलता , बिकना – बिकाऊ
  • अव्ययज : ऊपर – ऊपरी , भीतर – भीतर – भीतरी , बाहर – बाहरी
  • संबंध की विभक्ति लगाकार — लाल रंग की साड़ी , तेज बुद्धि का आदमी , सोनू का घर , गरीबों की दुनिया ।

नोट : विशेषण पदों के निर्माण से संबंधित बातों की विस्तृत चर्चा ‘ प्रत्यय प्रकरण ‘ में की जा चुकी है ।

* विशेषणों का रूपान्तर कैसे होता हैं :

विशेषण का अपना लिंग – वचन नहीं होता । वह प्रायः अपने विशेष्य के अनुसार अपने रूपों को परिवर्तित करता है । हिन्दी के सभी विशेषण दोनों लिंगों में समान रूप से बने रहते हैं ; केवल आकारान्त विशेषण स्त्री ० में ईकारान्त हो जाया करता है ।

अपरिवर्तित रूप
  1. बिहारी लड़के भी कम प्रतिभावान् नहीं होते ।
  2. बिहारी लड़कियाँ भी कम सुन्दर नहीं होती ।
  3. वह अपने परिवार की भीतरी कलह से परेशान है ।
  4. उसका पति बड़ा उड़ाऊ है ।
  5. उसकी पत्नी भी उड़ाऊ ही है ।
परिवर्तित रूप
  1. अच्छा लड़का सर्वत्र आदर का पात्र होता है ।
  2. अच्छी लड़की सर्वत्र आदर की पात्रा होती है ।
  3. बच्चा बहुत भोला – भाला था ।
  4. बच्ची बहुत भोली भाली थी ।
  5. हमारे वेद में ज्ञान की बातें भरी – पड़ी है ।
  6. हमारी गीता में कर्मनिरत रहने की प्रेरणा दी गई है ।
  7. महान आयोजन महती सभा
  8. विद्वान सर्वत्र पूजे जाते हैं ।
  9. विदुषी स्त्री समादरणीया होती है ।
  10. राक्षस मायावी होता था ।
  11. राक्षसी मायाविनी होती थी ।

जिन विशेषण शब्दों के अन्त में ‘ इया ‘ रहता है , उनमें लिंग के कारण रूप – परिवर्तन नहीं होता । जैसे-

मुखिया , दुखिया , बढ़िया , घटिया , छलिया ।

दुखिया मर्दो की कमी नहीं है इस देश में ।

दुखिया औरतों की भी कमी कहाँ है इस देश में ।

उर्दू के उम्दा , ताजा , जरा , जिंदा आदि विशेषणों का रूप भी अपरिवर्तित रहता है । जैसे –

आज की ताजा खबर सुनो ।

पिताजी ताजा सब्जी लाये हैं ।

वह आदमी अब तलक जिंदा है ।

वह लड़की अभी तक जिंदा है ।

सार्वनामिक विशेषणों के रूप भी विशेष्यों के अनुसार ही होते हैं । जैसे –

जैसी करनी वैसी भरनी

यह लड़का वह लड़की

ये लड़के – लड़कियाँ

जो तद्भव विशेषण ‘ आ ‘ नहीं रखते उन्हें ईकारान्त नहीं किया जाता है । स्त्री ० एवं पुँ ० बहुवचन में भी उनका प्रयोग वैसा ही होता है । जैसे –

ढीठ लड़का कहीं भी कुछ बोल जाता है ।

ढीठ लड़की कुछ न कुछ करती रहती है ।

वहाँ के लड़के बहुत ही ढीठ हैं ।

जब किसी विशेषण का जातिवाचक संज्ञा की तरह प्रयोग होता है तब स्त्री.- पुं . भेद बराबर स्पष्ट रहता है । जैसे –

उस सुन्दरी ने पृथ्वीराज चौहान को ही वरण किया ।

उन सुन्दरियों ने मंगलगीत प्रारंभ कर दिए ।

परन्तु , जब विशेषण के रूप में इनका प्रयोग होता है तब स्त्रीत्व सूचक ‘ ई ‘ का लोप हो जाता है । जैसे –

उन सुन्दर बालिकाओं ने गीत गाए ।

चंचल लहरें अठखेलियाँ कर रही हैं ।

मधुर ध्वनि सुनाई पड़ रही थी ।

जिन विशेषणों के अंत में ‘ वान् ‘ या ‘ मान् ‘ होता है , उनके पुँल्लिंग दोनों बचनों में ‘ वान् ‘ या ‘ मान् ‘ और स्त्रीलिंग दोनों वचनों में ‘ वती ‘ या ‘ मती ‘ होता है । जैसे –

गुणवान लड़का : गुणवान् लड़के

गुणवती लड़की : गुणवती लड़कियाँ

बुद्धिमान लड़का : बुद्धिमान लड़के

बुद्धिमती लड़की : बुद्धिमती लड़कियाँ

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