By | September 8, 2021
वाक्य – प्रकरण किसे कहते हैं

आप जानते हैं वाक्य – प्रकरण किसे कहते हैं ? तो आज हम आपको ” वाक्य – प्रकरण किसे कहते हैं ” के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको वाक्य – प्रकरण किसे कहते हैं पता चलेगा। तो आइये जानते हैं “ वाक्य – प्रकरण किसे कहते हैं”

वाक्य – प्रकरण किसे कहते हैं ?

” पदों का वैसा समूह , जो पूर्णभाव को स्पष्ट करे , यानी जिसके सुनने से कहनेवाले का अभिप्राय समझ में आ जाए , ‘ वाक्य ‘ कहलाता है । “

जैसे – मेरे लिए यह कहना कठिन है कि गिरीश कर्नाड बड़े लेखक हैं या बड़े अभिनेता या बड़े निर्देशक ।

कभी कभी प्रसंगानुसार एक या दो पद भी वाक्य का काम कर जाते हैं , क्योंकि उनकी पूर्णता प्रसंग में ही रहती है । जैसे –

प्रवर ! क्या कर रहे हो ?

पढ़ रहा हूँ ।

क्या तुम पढ़ रहे हो ?

हाँ ।

यहाँ , ‘ पढ़ रहा हूँ और ‘ हाँ ‘ दोनों में भावों की पूर्णता है –

पढ़ रहा हूँ – मैं पढ़ रहा हूँ ।

हाँ – हाँ , मैं पढ़ रहा हूँ ।

अतएव , ये दोनों भी वाक्य ही हुए ।

वाक्य के छह आवश्यक तत्त्व किया किया है ?

1. सार्थकता : वाक्यों में सार्थक पदों का प्रयोग होना चाहिए निरर्थक शब्दों के प्रयोग से भावाभिव्यक्ति नहीं हो पाती है । बावजूद इसके कभी कभी निरर्थक से लगनेवाले पद भी भाव अभिव्यक्त करने के कारण वाक्यों का गठन कर बैठते हैं । जैसे-

तुम बहुत बक – बक कर रहे हो ।

चुप भी रहोगे या नहीं ?

इस वाक्य में ‘ बक बक ‘ निरर्थक – सा लगता है ; परन्तु अगले वाक्य से अर्थ समझ में आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है ।

2. आकांक्षा : एक पद को सुनने के बाद दूसरे पद को जानने की इच्छा ही ‘ आकांक्षा ‘ है । यदि वाक्य में आकांक्षा शेष रहा जाती है तो उसे अधूरा वाक्य माना जाता है ; क्योंकि उससे अर्थ पूर्ण रूप से अभिव्यक्त नहीं हो पाता है । जैसे- यदि कहा जाय ।

‘ खाता है तो स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि क्या कहा जा रहा है किसी के भोजन करने की बात कही जा रही है या Bank के खाते के बारे में ?

3. आसत्ति या निकटता : पदों के बीच समान दूरी रहती है । इसी तरह वाक्य एक निरंतर प्रवाह में बोला या लिखा जाता है । अलग – अलग दूरियों एवं समयान्तराल रहने पर वाक्य अपना वजूद खो देता है ; अर्थ – बोधन की क्षमता त्याग देता है ।

गंगा पश्चिम से पूरब का आर बहती है ।

घेरे के अन्दर पदों के बीच की दूरी और समयान्तराल असमान होने के कारण वे अर्थ – ग्रहण खो देते हैं , जबकि नीचे उन्हीं पदों को समान दूरी और प्रवाह में रखने के कारण वे पूर्ण अर्थ दे रहे हैं।

अतएव , वाक्य को स्वाभाविक एवं आवश्यक बलाघात आदि के साथ बोलना पूर्ण अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है ।

4. योग्यता : वाक्यों की पूर्णता के लिए उसके पदों , पात्रों , घटनाओं आदि का उनके अनुकूल ही होना चाहिए । अर्थात् वाक्य लिखते या बोलते समय निम्नलिखित बातों पर निश्चित रूप से ध्यान देना चाहिए –

( a ) पद प्रकृति विरुद्ध नहीं हो : हर एक पद की अपनी प्रकृति ( स्वभाव / धर्म ) होती है । यदि कोई कहे मैं आग खाता हूँ । हाथी ने दौड़ में घोड़े को पछाड़ दिया ।

उक्त वाक्यों में पदों की प्रकृतिगत योग्यता की कमी है । आग खायी नहीं जाती । हाथी घोड़े से तेज नहीं दौड़ सकता ।

इसी जगह पर यदि कहा जाय –

मैं आम खाता हूँ ।

घोड़े ने दौड़ में हाथी को पछाड़ दिया ।

तो दोनों वाक्यों में योग्यता आ जाती है ।

( b ) बात – समाज , इतिहास , भूगोल , विज्ञान आदि विरुद्ध न हो : वाक्य की बातें समाज , इतिहास , भूगोल , विज्ञान आदि सम्मत होनी चाहिए । ऐसा नहीं कि जो बात हम कह रहे हैं , वह इतिहास आदि विरूद्ध है । जैसे –

दानवीर कर्ण द्वारका के राजा थे ।

महाभारत 25 दिन तक चला ।

भारत के उत्तर में श्रीलंका है ।

ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के परमाणु परस्पर मिलकर कार्बनडाइऑक्साइड बनाते हैं ।

5. क्रमबद्धता : भाषा प्रायः दो प्रकार की होती है — संयोगात्मक और वियोगात्मक । इस बात की विशद् चर्चा ‘ हिन्दी भाषा ‘ पाठ में की गई है । हिन्दी के वियोगात्मक रूप होने के कारण इनके पदों का अपना एक निश्चित क्रम है । हिन्दी भाषा के वाक्यों की संरचना इस प्रकार होती है –

( a ) कर्ता + क्रिया

उदाहरण : कुत्ता भौंकता है । तारे टिमटिमाते हैं ।

चाँद विहँसता है । मच्छर काटता है .

( b ) कर्ता + पूरक + क्रिया

उदाहरण : कुत्ता पागल हो गया है ।

अंशु खुश दिखाई पड़ती है ।

चाँद सुन्दर लगता है ।

( c ) कर्त्ता + कर्म + क्रिया

उदाहरण : रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गीतांजलि लिखी ।

दधीचि ने अस्थिदान किया था ।

बच्चों ने उन्हें सँभाला ।

( d ) कर्ता + कर्म + पूरक + क्रिया

उदाहरण : छात्रों ने मुझे मॉनीटर बनाया ।

जज ने कैदी को मुक्त किया ।

मेंहदी हसन गज़ल अच्छा गाते हैं ।

( e ) कर्ता + गौण कर्म + मुख्य कर्म + क्रिया

उदाहरण : मैंने नंगों को कपड़े दिए हैं ।

माता ने बच्चे को दूध पिलाया ।

द्रोण ने अर्जुन को धनुर्विद्या सिखायी ।

( f ) कर्ता + अधिकरण + अपादान + सम्प्रदान + करण + कर्म + क्रिया

उदाहरण : राम ने लंका में पंचवटी से अपहृत सीता के लिए अपने बाण से रावण को मारा ।

( g ) कालवाचक अधिकरण + अन्य अधिकरण ( दो – दो अधिकरण रहने की स्थिति में )

उदाहरण : संध्या में घर – घर में रोशनी चमक उठी ।

वर्षाऋतु में आकाश में घने बादल रहते हैं ।

( h ) संबोधन कारक को पहले लिखा जाना चाहिए ।

उदाहरण : मजदूरो , उठो , जागो और अपनों को पहचानो ।

सिपाहियो , उठो और आगो बढ़ो ।

नोट : पदों के क्रम से संबंधित बातें विस्तार से कारक – प्रकरण में दे दी गई हैं ।

6. अन्वय : अन्वय का अर्थ है – मेल | वाक्य में क्रिया के साथ विविध पदों का आपसी मेल ही ‘ अन्वय ‘ कहलाता है । वाक्य में लिंग , वचन , कारक , पुरुष , काल , वाच्य आदि का क्रिया के साथ अनुकूल संबंध निश्चित रूप से होना चाहिए ।

वाक्य के मुख्यतः कितने अंग होते हैं ?

वाक्य के मुख्यतः दो आवश्यक अंग होते हैं –

( a ) उद्देश्य : जिसके बारे में कहा जाय , उसे ‘ उद्देश्य ‘ कहते हैं ।

सामान्यतः वाक्य का कर्ता ही उसका उद्देश्य हुआ करता है ।

( b ) विधेय : उद्देश्य के बारे में जो कुछ कहा जाय , उसे ‘ विधेय ‘ कहते हैं । वाक्य का विधेय प्रायः क्रिया होती है ।

इसके साथ ही उद्देश्य के साथ आनेवाले पदों या पदबंधों को ‘ उद्देश्य का विस्तार ‘ और विधेय के साथ आनेवाले पदों या पदबंधों को ‘ विधेय का विस्तार ‘ कहा जाता है ।

वाक्य – रचना किसे कहते हैं ? और इसके नियमो को लिखे ?

” व्याकरण – सिद्ध पदों को मेल के अनुसार यथाक्रम रखने को ही ‘ वाक्य – रचना ‘ कहते हैं । ” वाक्य का एक पद दूसरे से लिंग , वचन , पुरुष , काल आदि का जो संबंध रखता है , उसे ही ‘ मेल ‘ कहते हैं । जब वाक्य में दो पद एक ही लिंग – वचन – पुरुष काल और नियम के हों तब वे आपस में मेल , समानता या सादृश्य रखनेवाले कहे जाते हैं ।

कर्ता और क्रिया में मेल

कर्ता और क्रिया में मेल से संबधित निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए –

1. चिह्न – रहित कर्ता की क्रिया कर्त्तानुसार हो । जैसे –

शेर दहाड़ता है ।

ऋचा वेद पढ़ रही है ।

गंगा हिमालय से निकलती है ।

चाँद अपनी चाँदनी से जगत् को नहलाता है ।

2. एक ही लिंग वचन – पुरुष के चिह्न रहित अनेक कर्ता के रहने पर क्रिया बहुवचन और लिंग में कर्ता के अनुसार हो , यदि कर्ता और , तथा , एवं , व आदि से जुड़े हों । जैसे –

संगम , निखिल , शान्तनु और गोविंद खेल रहे हैं ।

राजलक्ष्मी , निवेदिता , अन्नू और वर्षा कैरम खेल रही हैं ।

3. अनेक चिह्न रहित कर्ता ‘ या , अथवा , वा ‘ आदि से जुड़े हों तो क्रिया अंतिम कर्ता के अनुसार हो । जैसे –

शरद् या अभिनव गाँव में नहीं रहता है ।

पूजा अथवा कोमल ही यह नृत्य कर सकती है ।

लड़के या लड़कियाँ अव्वल आएँगी ।

घोड़ियाँ या घोड़े दौड़ – प्रतियोगिता में भाग लेंगे ।

4. यदि वाक्य में उत्तम पुरुष , मध्यम पुरुष और अन्य पुरुष दोनों के साथ या एक के साथ कर्ता होकर आए तो क्रिया उत्तम पुरुष के अनुसार होगी यानी पहले मध्यम पुरुष फिर अन्य पुरुष और अंत में उत्तम पुरुष आएगा ( 231 ) जैसे-

तुम , वह और मैं चलूँगा ।

केवल दो रहने पर -21 या 23 लागू होगा ।

तुम और मैं चलूँगा ।

तुम और वह चलेगा ।

5 . क्रिया मुख्य कर्ता के अनुसार होगी । जैसे –

लड़की सूखकर काठ गई ।

औरतें भी आदमी कहलाती हैं ।

6. एक ही कर्ता की दो या अनेक क्रियाएँ हों तो कर्त्ता का चिह्न केवल पहली क्रिया के अनुसार आता है । जैसे –

मेरे सब छात्रों ने एक ही स्थान पर पढ़ाई लिखाई की और खेले – कूदे भी ।

7 . दो या अधिक क्रियाओं के समान कर्ता ‘ को बार – बार न लाकर केवल एक बार लाते हैं । जैसे –

वह अब खाती – पीती है ।

कर्म और क्रिया में मेल

1 . यदि कर्म चिह्न रहित और कर्ता चिह्न युक्त हो तो क्रिया कर्मानुसार होगी । जैसे –

रामू ने रोटी खायी ।

सीता ने भात खाया ।

माँ ने भोजन बनाया ।

2 . यदि कर्ता और कर्म दोनों चिह्न – युक्त हों तो क्रिया पुँ ० , एकवचन , अन्य पुरुष की होगी । जैसे –

अंशु ने अपनी सहेलियों को बुलाया ।

दासी कहने लगी कि रानी ने मुझे डाँटा ।

3. यदि कर्म नहीं रहे तो चिह्न – युक्त कर्ता की क्रिया सदा पुरुष एकवचन , अन्य पुरुष की होगी । जैसे –

पिताजी ने पूछा था ।

गुरुजी ने पढ़ाया था ।

माताजी ने सुना था ।

4. अंग वाक्य और क्रियार्थक संज्ञा के अनुसार होनेवाली क्रियाएँ सर्वदा एकवचन , पुँ ० , अन्य पुरुष में होती है । जैसे –

तूने कहा कि पुस्तक अच्छी है ।

टहलना स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है ।

5. यदि कर्ता के लिंग में संदेह हो तो क्रिया पुंल्लिंग होगी । जैसे-

महाभारत में ऐसा लिखा है ।

कौन दरवाजा खटखटा रहा है ?

संज्ञा और सर्वनाम में मेल

1. सर्वनाम में उसी संज्ञा के लिंग और वचन होते हैं , जिसके बदले वह आता है ; परन्तु कारकों में भेद रहता है । जैसे-

प्रखर ने कहा कि मैं जाऊँगा ।

शीला ने कहा कि मैं यहीं रूकूँगी ।

2. संपादक , ग्रंथकार , किसी सभा का प्रतिनिधि और बड़े बड़े अधिकारी अपने लिए ‘ मैं ‘ की जगह ‘ हम ‘ का प्रयोग करते हैं । जैसे-

हमने पहले अंक में ऐसा कहा था ।

हम अंतिम अध्याय लिख रहे हैं ।

हम अपने राज्य की सड़कों को स्वच्छ रखेंगे ।

3. एक प्रसंग में किसी एक संज्ञा के बदले पहली बार जिस वचन में सर्वनाम का प्रयोग करे , आगे के लिए भी वही वचन रखना उचित है । जैसे –

अंकित ने संजय से कहा कि मैं तुझे कभी परेशान नहीं करूँगा । तुमने हमारी पुस्तक लौटा दी हैं । मैं तुमसे बहुत नाराज नहीं हूँ । ( अशुद्ध वाक्य है । )

पहली बार अंकित के लिए ‘ मैं ‘ का और संजय के लिए ‘ तू ‘ का प्रयोग हुआ है तो अगली बार भी ‘ तुमने ‘ की जगह ‘ तूने ‘ , ‘ हमारी ‘ की जगह ‘ मेरी ‘ और ‘ तुमसे ‘ की जगह ‘ तुझसे ‘ का प्रयोग होना चाहिए :

अंकित ने संजय से कहा कि मैं तुझे कभी परेशान नहीं करूंगा । तूने मेरी पुस्तक लौटा दी है । मैं तुझसे बहुत नाराज नहीं हूँ । ( शुद्ध वाक्य )

4. संज्ञाओं के बदले का एक सर्वनाम वही लिंग और वचन लेगा जो उनके समूह से समझे जाएँगे । जैसे –

शरद् और संदीप खेलने गए हैं , परन्तु वे शीघ्र ही आएँगे ।

श्रोताओं ने जो उत्साह और आनंद प्रकट किया उसका वर्णन नहीं हो सकता ।

5. ‘ तू ‘ का प्रयोग अनादर और प्यार के लिए होता है । जैसे –

रे नृप बालक , कालबस बोलत तोहि न संभार ।

धनुही सम त्रिपुरारिधनु विदित सकल संसार ।। ( गोस्वामी तुलसीदास )

तोहि — तुझसे

अरे मूर्ख ! तू यह क्या कर रहा है ? ( अनादर के लिए )

अरे बेटा , तू मुझसे क्यों रूठा है ? ( प्यार के लिए )

तू धार है नदिया की , मैं तेरा किनारा हूँ ।

6 . मध्यम पुरुष में सार्वनामिक शब्द की अपेक्षा अधिक आदर सूचित करने लिए किसी संज्ञा के बदले ये प्रयुक्त होते हैं –

( a ) पुरुषों के लिए : महाशय , महोदय , श्रीमान् , महानुभाव , हुजूर , हुजूरवाला , साहब , जनाब इत्यादि ।

( b ) स्त्रियों के लिए : श्रीमती , महाशया , महोदया , देवी , बीबीजी आदि ।

7. आदरार्थ अन्य पुरुष में ‘ आप ‘ के बदले ये शब्द आते हैं –

( a ) पुरुषों के लिए : श्रीमान् , मान्यवर , हुजूर आदि ।

( b ) स्त्रियों के लिए : श्रीमती , देवी आदि ।

संबंध और संबंधी में मेल

1. संबंध के चिह्न में वही लिंग – वचन होते हैं , जो संबंधी के । जैसे-

रामू का घर

श्यामू की बकरी

दीनू के बेटे

2. यदि संबंधी में कई संज्ञाएँ बिना समास के आए तो संबंध का चिह्न उस संज्ञा के अनुसार होगा , जिसके पहले वह रहेगा । जैसे-

मेरी माता और पिता जीवित हैं । ( बिना समास के )

मेरे माता पिता जीवित है । ( समास होने पर )

क्रम – संबंधी कुछ अन्य बातें

1. प्रश्नवाचक शब्द को उसी के पहले रखना चाहिए , जिसके विषय में मुख्यतः प्रश्न किया जाता है । जैसे –

वह कौन व्यक्ति है ? वह क्या बनाता है ?

2. यदि पूरा वाक्य ही प्रश्नवाचक हो तो ऐसे शब्द ( प्रश्नसूचक ) वाक्यारंभ में रखना चाहिए । जैसे –

क्या आपको यही बनना था ?

3. यदि ‘ न ‘ का प्रयोग आदर के लिए आए तो प्रश्नवाचक का चिह्न नहीं आएगा और ‘ न ‘ का प्रयोग अंत में होगा । जैसे –

आप बैठिए न ।

आप मेरे यहाँ पधारिए न ।

4. यदि ‘ न ‘ क्या का अर्थ व्यक्त करे तो अंत में प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग करना चाहिए और ‘ न ‘ वाक्यान्त में होगा । जैसे –

वह आज – कल स्वस्थ है न ?

आप वहाँ जाते हैं न ?

5. पूर्वकालिक क्रिया मुख्य क्रिया के पहले आती है । जैसे –

वह खाकर विद्यालय जाता है ।

शिक्षक पढ़ाकर घर जाते हैं ।

6. विस्मयादिबोधक शब्द प्रायः वाक्यारंभ में आता है । जैसे –

वाह ! आपने भी खूब कहा है ।

ओह ! यह दर्द सहा नहीं जा रहा है ।

वर्तमान प्रयोग

कहीं कहीं उपर्युक्त नियमों का पालन नहीं किया जाता है ; क्योंकि : वाक्य के जिस भाग की प्रधानता दिखानी होती है , उसे पहले रखा जाता है । जैसे-

1. क्रिया कर्ता से पहले :

बुलाहट थी मेरी और गया वह ।

गलती तो मेरी थी , आप क्यों परेशान हैं ?

2. पूर्वकालिक क्रिया कर्ता से पहले :

मुझे देखकर वह घर में घुस गया था ।

साँप देखकर सभी डर जाते हैं ।

3. कर्म पहले :

तुम्हीं को वह बुला रहा है ।

उसी को मैं मारूंगा ।

4. करण पहले :

चाकू से उसने हाथ काट लिया ।

इसी कलम से उसने भी लिखा था ।

5. सम्प्रदान पहले :

आपके लिए ही मैंने इतना सहा है ।

तुम्हारे लिए वह रात दिन मेहनत करता रहा ।

6. अपादान पहले :

झूले से गिरी वह और रोने लगी उसकी माँ ।

पेड़ से पत्ता गिरा और आप लगे चौंकने ।

7. संबंध पहले :

मेरी तो आपने सुनी ही नहीं ।

मेरी घड़ी खो गई और आप हँस रहे हैं ।

8. संबंध से पहले संबंधी पहले :

घर किसका है ?

घर मेरा और झगड़ा तुम दोनों में ।

9. अधिकरण पहले :

तिल में भी तेल होता है ।

पेड़ पर बन्दर था ।

10. संबोधन से पहले अन्य पद :

सुनते हो , लड़को ! आज ही शिक्षक दिवस है ।

अभी – अभी , बेटे ! खाने की जिद मत करो ।

11. क्रियाविशेषण पहले :

अभी – अभी वह यहीं बैठा था ।

धीरे – धीरे कछुआ दौड़ने का अभ्यास करने लगा ।

12. क्रियाविशेषण कर्म से पहले :

वह भली – भाँति आपको पहचानता है ।

13. विधेय – विशेषण पहले :

सच्चे और निराले तो किसी के कार्य नहीं होते ।

14. पूरक पहले :

चोर तो उनका लड़का निकला , इस बच्चे का क्या अपराध है ?

15. कविताओं में क्रमभंग देखा जाता है :

दो प्राणी भी अवनिब्रज के साथ जो बैठते थे ।

तो आने की न मधुवन से बात ही थे चलाते ।

पूछा जाता परस्पर भी व्यग्रता से यही था ।

दोनों प्यारे कुँवर अवलौं लौटके क्यों न आए ? ( पिप्रवास – हरिऔध )


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