By | September 6, 2021
What is Case कारक किसे कहते हैं

आप जानते हैं कारक किसे कहते हैं ? तो आज हम आपको ” कारक किसे कहते हैं ” के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको कारक किसे कहते हैं पता चलेगा। तो आइये जानते हैं “कारक किसे कहते हैं”

कारक किसे कहते हैं ?

कारक क्रिया से संबंध परिभाषा चिह्न प्रकार परसगों का प्रयोग संज्ञा एवं सर्वनामों पर कारक का प्रभाव – अभ्यास ” जो क्रिया की उत्पत्ति में सहायक हो या जो किसी शब्द का क्रिया से संबंध बताए वह ‘ कारक है ।

” जैसे — माइकल जैक्सन ने पॉप संगीत को काफी ऊँचाई पर पहुँचाया ।

यहाँ ‘ पहुँचाना ‘ क्रिया का अन्य पदों माइकल जैक्सन , पॉप संगीत , ऊँचाई आदि से संबंध है । वाक्य में ‘ ने ‘ , ‘ को ‘ और ‘ पर ‘ का भी प्रयोग हुआ है । इसे कारक – चिह्न या परसर्ग या विभक्ति – चिह्न कहते हैं । यानी वाक्य में कारकीय संबंधों को बतानेवाले चिह्नों को कारक – चिह्न अथवा परसर्ग कहते हैं ।

हिन्दी में कहीं – कहीं कारकीय चिह्न लुप्त रहते हैं । जैसे –

घोड़ा दौड़ रहा था । वह पुस्तक पढ़ता है । आदि ।

यहाँ ‘ घोड़े ‘ ‘ वह ‘ और ‘ पुस्तक ‘ के साथ कारक – चिह्न नहीं है । ऐसे स्थलों पर शून्य चिह्न माना जाता है । यदि ऐसा लिखा जाय : घोड़ा ने दौड़ रहा था ।

उसने ( वह + ने ) पुस्तक को पढ़ता है ।

तो वाक्य अशुद्ध हो जाएँगे ; क्योंकि प्रथम वाक्य की क्रिया अपूर्ण भूत की है । अपूर्णभूत में ‘ कर्ता ‘ के साथ ने चिह्न वर्जित है । दूसरे वाक्य में क्रिया वर्तमान काल की है । इसमें भी कर्ता के साथ ने चिह्न नहीं आएगा । अब यदि ‘ वह पुस्तक को पढ़ता है ‘ और ‘ वह पुस्तक पढ़ता है ‘ में तुलना करें तो स्पष्टतया लगता है कि प्रथम वाक्य में ‘ को ‘ का प्रयोग अतिरिक्त या निरर्थक हैं ; क्योंकि वगैर ‘ को ‘ के भी वाक्य वही अर्थ देता है । हाँ , कहीं – कहीं ‘ को ‘ के प्रयोग करने से अर्थ बदल जाया करता है । जैसे-

वह कुत्ता मारता है : जान से मारना

वह कुत्ते को मारता है : पीटना

हिन्दी भाषा में कारकों की कुल संख्या कितने मानी गई है ?

हिन्दी भाषा में कारकों की कुल संख्या आठ मानी गई है , जो निम्नलिखित हैं-

कारक परसर्ग / विभक्ति
1. कर्ता कारक शून्य , ने ( को , से , द्वारा )
2. कर्म कारक कास्क शून्य , को
3. करण कारक से , द्वारा ( साधन या माध्यम )
4. सम्प्रदान कारक को , के लिए
5. अपादान कारक से ( अलग होने का बोध )
6. संबंध कारक का – के – की , ना – ने – नी , रा – रे – री
7. अधिकरण कारक में , पर
8. संबोधन कारक हे , हो , अरे , अजी ……

कर्ता कारक

” जो क्रिया का सम्पादन करे , ‘ कर्ता कारक ‘ कहलाता है । “

अर्थात् कर्ता कारक क्रिया ( काम ) करता है । जैसे-

आतंकवादियों ने पूरे विश्व में आतंक मचा रखा है ।

इस वाक्य में ‘ आतंक मचाना ‘ क्रिया है , जिसका सम्पादक ‘ आतंकवादी ‘ है यानी कर्ता कारक ‘ आतंकवादी है ।

कर्ता कारक का परसर्ग ‘ शून्य ‘ और ‘ ने ‘ है । जहाँ ‘ ने ‘ चिह्न लुप्त रहता है , वहाँ कर्ता का शून्य चिह्न माना जाता है । जैसे — पेड़ – पौधे हमें ऑक्सीजन देते हैं ।

यहाँ पेड़ – पौधे में ‘ शून्य चिह्न ‘ है ।

कर्ता कारक में ‘ शून्य ‘ और ‘ ने ‘ के अलावा ‘ को ‘ और से / द्वारा चिह्न भी लगया जाता है । जैसे –

उनको पढ़ना चाहिए ।

उनसे पढ़ा जाता है

उनके द्वारा पढ़ा जाता है ।

कर्ता के ‘ ने ‘ चिह्न का प्रयोग :

सकर्मक क्रिया रहने पर सामान्य भूत , आसन्न भूत , पूर्णभूत , संदिग्ध भूत एवं हेतुहेतुमद् भूत में कर्ता के आगे ‘ ने ‘ चिह्न आता है । जैसे –

  • मैंने तो आपको कभी गैर नहीं माना । ( सामान्य भूत )
  • मैंने तो आपको कभी गैर नहीं माना है । ( आ ० भूत )
  • मैंने तो आपको कभी गैर नहीं माना था । ( पूर्ण भूत )
  • मैंने तो आपको कभी गैर नहीं माना होगा ।( सं ० भूत )
  • मैंने तो आपको कभी गैर नहीं माना होता । ( हेतु … भूत )

‘ भूलना क्रिया के कर्ता के साथ ‘ ने ‘ चिह्न का प्रयोग नहीं होता । जैसे-

वह तो भूले थे हमें , हम भी उन्हें भूल गए ।

आप अपना संकल्प न भूले होंगे ।

‘ लाना ‘ क्रिया भी अपने साथ कर्ता के ‘ ने ‘ चिहन का निषेध करती है । लाना — ‘ ले ‘ और ‘ आना ‘ के संयोग से बनी है । पहले इसका रूप ‘ ल्याना ‘ था , बाद में लाना हो गया । चूंकि इसका अंतिम खंड अकर्मक है , इसलिए इसका प्रयोग होने पर कर्ता कारक में ‘ ने ‘ चिह्न नहीं आता है । जैसे –

पिताजी बच्चों के लिए मिठाई लाए । श्यामू पीछे हो लिया ।

बोलना , समझना , बकना , जनना ( जन्म देना ) , सोचना और पुकारना क्रियाओं के कर्ता के साथ ‘ ने ‘ चिह्न विकल्प से आता है । जैसे –

  • महाराज बोले । ( प्रेमसागर )
  • वह झूठ बोला । ( पं ० अम्बिका प्र ० बाजपेयी )
  • रामचन्द्रजी ने झूठ नहीं बोला । ( पं ० रामजी लाल शर्मा )
  • उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला । ( बाल – विनोद )
  • उसने कई बोलियाँ बोलीं । ( पं ० अ ० प्र ० बाजपेयी )
  • हम तुम्हारी बात नहीं समझे ।
  • मैंने आपकी बात नहीं समझी ।
  • हम न समझे कि यह आना है या जाना तेरा । ( भट्ट जी )
  • तुम बहुत बके । ( पं ० अंबिकादत्त )
  • तुमने बहुत बका ।
  • भैंस पाड़ा जनी है । ( पं ० अंबिकादत्त )

नोट : पं ० केशवराम भट्ट ने स्पष्ट कहा है कि कर्म लुप्त रहने पर ‘ ने ‘ भी लुप्त रहता है , नहीं तो नहीं । बात ऐसी है कि हमारे विद्वानों और साहित्यकारों ने कर्म रहने पर भी कहीं तो कर्ता के साथ ‘ ने ‘ का प्रयोग किया है कहीं नहीं किया ।

सजातीय कर्म लेने के कारण जो अकर्मक क्रिया सकर्मक हो जाती है , उसके कर्ता के साथ ने ‘ चिह्न नहीं आता : किन्तु कोई कोई ऐसी कुछ क्रियाओं के साथ भूतकाल के अपूर्णभूत को छोड़ अन्य भेदों में लाते भी हैं । जैसे –

  • सिपाही कई लड़ाइयाँ लड़ा ।
  • वह शेर की बैठक बैठा ।( पं ० कामता प्र ० गुरु )
  • मैं क्रिकेट खेला । ( पं ० अ ० दत्त व्यास )
  • उसने टेढ़ी चाल चली ।
  • मैंने बड़े खेल खेले । ( पं ० अविका प्र ० वाजपेयी )
  • उसने चौपड़ खेली ।

नहाना , थूकना , छींकना और खांसना : ये अकर्मक क्रियाएँ हैं फिर भी अपने साथ कर्ता को ‘ ने ‘ चिह्न लाने के लिए बाध्य करती हैं । यानी इन क्रियाओं के प्रयोग होने पर भूतकाल के उक्त भेदों में कर्ता के साथ ‘ ने ‘ चिहन का प्रयोग अवश्यमेव होता है । जैसे—

मैंने सर्दी के कारण छीका है ।

आज आपने नहाया क्यों नहीं ?

दादाजी ने जोर से खाँसा था , तभी तो मम्मी अंदर चली गई ।

यह जहाँ – तहाँ किसने थूका है ?

उक्त चारों अकर्मक क्रियाओं के अलावा अन्य किसी अकर्मक क्रिया के रहने पर कर्ता के साथ ‘ ने ‘ चिह्न कभी नहीं आता । जैसे —

वह अभी – अभी आया है ।

मैं वहाँ कई बार गया हूँ ।

बच्चा अभी तो सोया था ।

संयुक्त क्रिया के सभी खंड सकर्मक रहने की स्थिति में भूतकाल के उक्त भेदों में कर्ता के साथ ‘ ने ‘ चिहन का प्रयोग होता है । जैसे-

सालिम अली ने पक्षियों को देख लिया था ।

मैंने इस प्रश्न का उत्तर दे दिया है ।

परन्तु , नित्यताबोधक सकर्मक संयुक्त क्रिया का कर्ता ‘ ने ‘ चिह्न कभी नहीं लाता है । जैसे –

  • वे बार बार गिना किये , हाथ कुछ न लगा । ( भारतेन्दु )
  • वह चित्र – सी चुपचाप खड़ी सुना की । ( पं ० अ ० व्यास )
  • इस दृश्य को पाण्डव सामने बैठे देखा किए । ( बाल भारत )
  • हजरत भी कल कहेंगे कि हम क्या किए । ( पं ० केशवराम भट्ट)

यदि संयुक्त अकर्मक क्रिया का अंतिम खण्ड ‘ डालना हो तो उक्त भूतकालों में कर्ता के साथ ‘ ने चिह्न अवश्य आता है ? किन्तु यदि अंतिम खंड देना ‘ हो तो ‘ ने ‘ चिह्न विकल्प से आता है । जैसे –

  • उसने रातभर जाग डाला । ( पं ० अ ० दत्त व्यास )
  • जब मानसिंह चढ़ आए तब पठानों की सेना चल दी । ( पं ० केशवराम भट्ट )
  • श्रीकृष्ण मथुरा चल दिए ।( प्रेम सागर )
  • मैं अपना – सा मुँह लेकर चल दिया । ( विद्यार्थी )

मुस्करा देना , हँस देना , रो देना : इन क्रियाओं के कर्ता ‘ ने ‘ चिह्न निश्चित रूप से लाते हैं । जैसे –

मोहन ने नारद को देखकर मुस्करा दिया ।

आकर के मेरी कब्र पर तुमने जो मुस्करा दिया ।

बिजली छिटक के गिर पड़ी और सारा कफन जला दिया । ( हबीय पेंटर )

मुकद्दर ने रो दिया हाथ मलकर । ( पं ० केशवराम मट्ट )

संकेत में संयुक्त क्रिया के अन्त में होना ‘ का हेतुहेतुमद्भूत रूप ‘ ने ‘ चिह्न के साथ भी प्रयुक्त होता है । जैसे –

यदि संजीव ने पढ़ा होता तो अवश्य सफल होता ।

यदि भाई जी आए थे तो आपने रोक लिया होता ।

प्रेरणार्थक रूप बन जाने पर सभी क्रियाएँ सकर्मक हो जाती हैं और सभी प्रेरणार्थक क्रियाओं के रहने पर सामान्य , आसन्न , पूर्ण , संदिग्ध आदि भूतकालों में कर्ता के साथ ‘ ने ‘ चिह्न आता है । जैसे-

राजू श्रीवास्तव ने सबों को हँसाया ।

माँ ने पत्र भिजवाया है ।

पुत्र ने प्रणाम कहलवाया है ।

अच्छे अंकों ने राहुल को सम्मान दिलाया ।

कठिन मेहनत ने हर्ष को डॉक्टर बनाया था ।

वर्तमान एवं भविष्यत् कालों में कर्ता के साथ ‘ ने ‘ चिहन कभी नहीं आता । जैसे –

मैं भी वह उपन्यास पढूंगा । तुम वह नाटक – संग्रह पढ़ते होगे ।

सालिम अली पक्षियों को पक्षी की निगाह से देखते हैं ।

अपूर्ण भूतकाल की क्रिया रहने पर कर्ता के साथ ‘ ने ‘ चिहन कभी नहीं आता है । जैसे –

वह तरुमित्रा का प्रतिनिधित्व कर रहा था ।

जब मि ० ग्लााड चलते थे , तब पेड़ – पौधे तक सहम जाते थे ।

पूरी लंका जल रही थी और विभीषण भजन कर रहे थे ।

‘ चुकना ‘ क्रिया रहने पर भूतकाल में भी कर्ता के साथ ‘ ने ‘ चिहन का प्रयोग नहीं होता है । जैसे-

मैं भात खा चुका / हूँ / था / होता । वह देख चुका था ।

सलोनी यह संग्रह पढ़ चुकी होगी

कर्म कारक

” जिस पर क्रिया ( काम ) का फल पड़े , ‘ कर्म कारक ‘ कहलाता है ।” जैसे —

तालिबानियों ने पाकिस्तान को रौंद डाला ।

सुन्दर लाल बहुगुना ने ‘ चिपको आन्दोलन ‘ चलाया ।

इन दोनों वाक्यों में पाकिस्तान ‘ और ‘ चिपको आन्दोलन ‘ कर्म हैं ; क्योंकि ‘ रौंद डालना ‘ और ‘ चलाना ‘ क्रिया से प्रभावित हैं ।

कर्म कारक का चिह्न ‘ को ‘ है ; परन्तु जहाँ ‘ को ‘ चिह्न नहीं रहता है , वहाँ कर्म का शून्य चिह्न माना जाता है । जैसे –

वह रोटी खाता है । भालू नाच दिखाता है ।

इन वाक्यों में रोटी ‘ और ‘ नाच ‘ दोनों के चिह्न – रहित कर्म हैं ।

कभी – कभी वाक्यों में दो – दो कर्मों का प्रयोग भी देखा जाता है , जिनमें एक मुख्य कर्म और दूसरा गौण कर्म होता है । प्रायः वस्तुबोधक को मुख्य कर्म और प्राणिबोधक को गौण कर्म माना जाता है । जैसे —

माँ ने बच्चे को दूध पिलायां (गौण कर्म मुख्य )

करण कारक

” वाक्य में जिस साधन या माध्यम से क्रिया का सम्पादन होता है , उसे ही ‘ करण – कारक कहते हैं । “

अर्थात् करण कारक साधन का काम करता है । इसका चिह्न ‘ से ‘ है , कहीं कहीं ‘ द्वारा का प्रयोग भी किया जाता है । जैसे-

चाहो , तो इस कलम से पूरी कहानी लिख लो ।

पुलिस तमाशा देखती रही और अपहर्ता बलेरो से लड़की को ले भागा ।

छात्रों को पत्र के द्वारा परीक्षा की सूचना मिली ।

उपर्युक्त उदाहरणों में कलम , बलेरो और पत्र करण कारक हैं । कभी कभी वाक्य में करण का चिहन लुप्त भी रहता है , वहाँ भ्रमित नहीं होना चाहिए , सीधे क्रिया के साधन खोजने चाहिए , जैसे — किससे या किसके द्वारा काम हुआ अथवा होता है ?

उदाहरण — मैं आपको आँखों देखी खबर सुना रहा हूँ । किससे देखी ? आँखों से ( करण )

आज भी संसार में करोड़ों लोग भूखों मर रहे हैं । ( भूखो – करण कारक )

करीम मियाँ ने दो – दो जवान बेटों को अपने हाथों दफनाया । ( हाथों – करण कारण )

प्रेरक कर्ता कारक में भी करण का ‘ से ‘ चिह्न देखा जाता है । जैसे –

यदि शत्रुओं से तेरा नाम न जपवाऊँ तो मैं विष्णुगुप्त चाणक्य नहीं ।

अहमदाबाद जाते हो तो मेरा प्रस्ताव लोगों से मनवा के छोड़ना ।

क्रिया की रीति या प्रकार बताने के लिए भी ‘ से ‘ चिह्न का प्रयोग किया जाता है । जैसे –

धीरे से बोलो , दीवार के भी कान होते हैं ।

जहाँ भी रहो , खुशी से रहो , यही मेरा आशीर्वाद है ।

सम्प्रदान कारक

‘ कर्ता कारक जिसके लिए या जिस उद्देश्य के लिए क्रिया का सम्पादन करता है , वह ‘ सम्प्रदान कारक होता है । ” जैसे —

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने बाढ़ पीड़ितों के लिए अनाज और कपड़े बँटवाए ।

इस वाक्य में ‘ बाढ़ पीड़ित ‘ सम्प्रदान कारक है ; क्योंकि अनाज और कपड़े बँटवाने का काम उनके लिए ही हुआ।

सम्प्रदान कारक का चिह्न ‘ को ‘ भी है ; लेकिन यह कर्म के ‘ को ‘ की तरह नहीं ‘ के लिए ‘ का बोध कराता है । जैसे –

गृहिणी ने गरीबों को कपड़े दिए । माँ ने बच्चे को मिठाइयाँ दीं ।

इन उदाहरणों में गरीबों को …..गरीबों के लिए और बच्चे को ….बच्चे के लिए की ओर संकेत है ।

प्रथम उदाहरण में एक और बात है ……. जब कोई वस्तु किसी को हमेशा हमेशा के लिए ( दान आदि अर्थ में ) दी जाती है तब वहाँ ‘ को ‘ का प्रयोग होता है जो ‘ के लिए ‘ का बोध कराता है । प्रथम उदाहरण में गरीबों को कपड़े दान में दिए गए हैं । इसलिए ‘ गरीब ‘ सम्प्रदान कारक का उदाहरण हुआ ।

यदि गरीबों की जगह ‘ धोबी ‘ का प्रयोग किया जाय तो वहाँ ‘ को ‘ , ‘ के लिए ‘ का बोधक नहीं होगा ।

नमस्कार आदि के लिए भी सम्प्रदान कारक का चिह्न ही लगाया जाता है । जैसे-

पिताजी को प्रणाम । ( पिताजी के लिए प्रणाम )

दादाजी को नमस्कार ! ( दादाजी के लिए नमस्कार )

को और के लिए ‘ के अतिरिक्त के वास्ते ‘ और ‘ के निमित्त ‘ का भी प्रयोग होता है । जैसे-

रावण के वास्ते ही रामावतार हुआ था । यह चावल पूजा के निमित्त है ।

अपादान कारक

” वाक्य में जिस स्थान या वस्तु से किसी व्यक्ति या वस्तु की पृथकता अथवा तुलना का बोध होता है , वहाँ अपादान कारक होता है । “

यानी अपादान कारक से जुदाई या विलगाव का बोध होता है । प्रेम , घृणा , लज्जा , ईर्ष्या , भय और सीखने आदि भावों की अभिव्यक्ति के लिए अपादान कारक का ही प्रयोग किया जाता है ; क्योंकि उक्त कारणों से अलग होने की क्रिया किसी – न – किसी रूप में जरूर होती है । जैसे-

पतझड़ में पीपल और ढाक के पेड़ों से पत्ते झड़ने लगते हैं ।

वह अभी तक हैदराबाद से नहीं लौटा है ।

मेरा घर शहर से दूर उसकी बहन मुझसे लजाती है ।

खरगोश बाघ से बहुत डरता है ।

नूतन को गंदगी से बहुत घृणा है ।

हमें अपने पड़ोसी से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए ।

मैं आज से पढ़ने जाऊँगा ।

संबंध कारक

” वाक्य में जिस पद से किसी वस्तु , व्यक्ति या पदार्थ का दूसरे व्यक्ति , वस्तु या पदार्थ से संबंध प्रकट हो , ‘ संबंध कारक ‘ कहलाता है । ” जैसे-

अंशु की बहन आशु है । यहाँ ‘ अंशु ‘ संबंध कारक है ।

यों तो संबंध और संबोधन को कारक माना ही नहीं जाना चाहिए , क्योंकि इसका संबंध क्रिया से किसी रूप में नहीं होता । हाँ , कर्ता से अवश्य रहता है । जैसे –

भीम के पुत्र घटोत्कच ने कौरवों के दाँत खट्टे कर दिए ।

उक्त उदाहरण में हम देखते हैं कि क्रिया की उत्पत्ति में अन्य कारकों की तरह संबंध सक्रिय नहीं है ।

फिर भी , परंपरागत रूप से संबंध को कारक के भेदों में गिना जाता रहा है । इसका एकमात्र चिहन का है , जो लिंग और वचन से प्रभावित होकर ‘ की ‘ और ‘ के ‘ बन जाता है । इन उदाहरणों को देखें –

गंगा का पुत्र भीष्म बाण चलाने में बड़े – बड़ों के कान काटते थे ।

नदी के किनारे – किनारे वन – विभाग ने पेड़ लगवाए ।

मेनका की पुत्री शकुन्तला भरत की माँ बनी ।

जब सर्वनाम पर संबंध कारक का प्रभाव पड़ता है , तब ना ने नी ‘ और ‘ रा – रे – री ‘ हो जाता है । जैसे

अपने दही को कौन खट्टा कहता है ?

मेरे पुत्र और तेरी पुत्री का जीवन सुखमय हो सकता है ।

संबंध कारक के चिह्नों के प्रयोग से कई स्थलों पर अर्थभेद भी हो जाया करता है । निम्नलिखित उदाहरण देखें –

उसके बहन नहीं है । ( उसको बहन नहीं है )

उसकी बहन नहीं है । ( यानी दूसरे की बहन है , उसकी नहीं )

अधिकरण कारण

” वाक्य में क्रिया का आधार , आश्रय , समय या शर्त ‘ अधिकरण ‘ कहलाता है । ”

आधार को ही अधिकरण माना गया है । यह आधार तीन तरह का होता है स्थानाधार , समयाधार और भावाधार ।

जब कोई स्थानवाची शब्द क्रिया का आधार बने तब वहाँ स्थानाधिकरण होता है जैसे-

बन्दर पेड़ पर रहता है ।

चिड़ियाँ पेड़ों पर अपने घोंसले बनाती है ।

मछलियाँ जल में रहती है ।

मनुष्य अपने घर में भी सुरक्षित कहाँ रहता है ।

जब कोई कालवाची शब्द क्रिया का आधार हो तब वहाँ कालाधिकरण होता है । जैसे-

मैं अभी दो मिनटों में आता हूँ ।

जब कोई क्रिया ही क्रिया के आधार का काम करे , तब वहाँ भावाधिकरण होता है । जैसे –

शरद पढ़ने में तेज है । राजलक्ष्मी दौड़ने में तेज है ।

कहीं कहीं अधिकरण कारक के चिह्न ( में , पर ) लुप्त भी रहते हैं । जैसे –

आजकल वह राँची रहता है ।

मैं जल्द ही आपके दफ्तर पहुँच रहा हूँ ।

ईश्वर करे , आपके घर मोती बरसे ।

कहीं कहीं अधिकरण का चिह्न रहने पर भी वहाँ अन्य कारक होते हैं । जैसे-

आजकल के नेता लोग रुपयों पर बिकते हैं । ( ‘ रुपयों के लिए ‘ भाव है )

संबोधन कारक

” जिस संज्ञापद से किसी को पुकारने , सावधान करने अथवा संबोधित करने का बोध हो , ‘ संबोधन ‘ कारक कहते हैं । ”

संबोधन प्रायः कर्ता का ही होता है , इसीलिए संस्कृत में स्वतंत्र कारक नहीं माना गया है । संबोधित संज्ञाओं में बहुवचन का नियम लागू नहीं होता और सर्वनामों का कोई संबोधन नहीं होता , सिर्फ संज्ञा पदों का ही होता है ।

नीचे लिखे वाक्यों को देखें –

भाइयो एवं बहनो ! इस सभा में पधारे मेरे सहयोगियो ! मेरा अभिवादन स्वीकार करें ।

हे भगवान् ! इस सड़ी गर्मी में भी लोग कैसे जी रहे हैं ।

बच्चो ! बिजली के तार को मत छूना ।

देवियो और सज्जनो ! इस गाँव में आपका स्वागत है ।

नोट : सिर्फ संबोधन कारक का चिह्न संबोधित संज्ञा के पहले आता है ।

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